Tuesday, 5 August 2014

नारी या एक देह



पेड़ पे लटकी थी
रस्सी के एक टुकड़े के सहारे
वो एक बेजान देह

हंसती थी खिलखिलाती थी
चंद घंटो पहले तक जो
अब है वो एक बेजान देह

चढ़ गयी कुछ वीभत्स विचारो
की बलि वेदी पर और बन गयी
इंसान से एक बेजान देह

कुछ सपने थे कुछ अरमान भी थे
उन अरमानो के साथ लटकी है
वो एक बेजान देह

अक्सर कुचला जाता था उसका अस्तित्व
जो कभी था ही नही, वो पहले थी
एक जिन्दा देह अब है एक बेजान देह

नारी जननी जैसे शब्द तो जैसे
एक झुनझुना है जिससे उसको बहलाया है
हकीकत में है वो एक देह
कभी जिन्दा तो कभी एक बेजान देह  

चीखी थी वो चिल्लाई भी थी
पर इस कलियुग में कोई केशव भी नही
जो बचा सके उसे 
बनने से एक बेजान देह

और अब तो एक “विशाल” भीड़ है
आ गये है सभी अपनी रोटियाँ सेकने को
आखिर छोड़कर एक नारी का आवरण
आज वो बन गयी है एक बेजान देह    
                             विशाल सर्राफ “धमोरा”