Sunday, 31 August 2014

घडी और जिन्दगी



मुँह अँधेरे जब सब सोये
रहते है नींद के आगोश में
तब चुपके से उठती है जिन्दगी
घड़ी की टिक टिक के साथ |

तोड़ कर कोहरे का पहरा
जब उतरती है अलसाई सी धुप                             
तब जीने को मचलती है जिन्दगी
घड़ी की टिक टिक के साथ |

डाल कर दाना पानी पेट में
जब हो जाते है सब तैयार
तब जीतने को भागती है जिन्दगी
घड़ी की टिक टिक के साथ |

थक कर दिन भर काम के
बोझ से आखिर शाम को
धीरे से घर लौटती है जिन्दगी
घड़ी की टिक टिक के साथ |

थोड़ी ख़ुशी थोडा गम
थोड़ी सी हंसी तो ढेर सा अपनापन
अपनों के साथ बांटती है जिन्दगी
घड़ी की टिक टिक के साथ |

पर अगले दिन की तैयारी करने
से पहले इतना सोचती है जिन्दगी
की “विशाल” क्यों चलती है जिन्दगी
घड़ी की टिक टिक के साथ |
                         विशाल सर्राफ “धमोरा”