Tuesday, 5 August 2014

चिंतामणि जी की बस यात्रा



मेरे एक परम मित्र है श्रीमान चिंतामणी कुमार "शोषित" एक आम आदमी मेरी और आपकी तरह उनकी जिन्दगी के कुछ किस्से मेरी जुबानी .............

यात्रियों से लदी-थदी उस सरकारी बस में
करके प्रभु का विचार
‘चिंतामणि’ जी हो लिए सवार |

बस तो बस, बस थी
देश की भांति हालत उसकी भी पस्त थी |

शीशे अरमानो की तरह टूटे हुए थे
दरवाजे वामपंथियों जैसे रूठे हुए थे|

इतने में बस भी चल चुकी थी
सीटो को देख कुर्सी चाहने वालो की
हसरते भी मचल चुकी थी |

बचते-बचाते परिचालक महोदय चिंतामणि के पास आए
चिंतामणि ने दस रुपये उनकी और बढाए |

परिचालक ने चलते-चलते दस की नोट जेब में डाली,
तभी चिंतामणि ने टिकट की मांग कर डाली |

टिकट मांगने पर परिचालक ने उन्हें यूँ निहारा ,
जैसे उन्होंने उसके सर पे पत्थर दे मारा |

वो बोला टिकट को क्या तू कुतरेगा,
अभी दो मिनट बाद आम बस्ती में तु उतरेगा |

देख कर उसका ये रवैया बेबाक ,
चिंतामणि जी रह गये अवाक् |

तब चिंतामणि जी बुरी तरह बिगड़ गये ,
चप्पलों समेत परिचालक के सर पे चढ़ गये |

परिचालक भी सरकारी साला था ,
ऐसे चिंतामनियो से उसका रोज़ पड़ता पाला था |

जहाँ जरूरत थी वहा पूरा हिस्सा पहुँचाता था ,
तभी तो उस माल को अपना मानकर खाता था |

देख परिचालक के ‘सरकारी’ तेवर
सहयात्रियों ने चिंतामणि को पंगा न लेने की नसीहत दे डाली |
और इस तरह एक और आम आदमी ने
मजबूरी में ‘रिश्वत’ दे डाली |

पर चिंतामणि जी पूछ रहे “विशाल” से एक ही बात ,
मैं एक आम आदमी, क्या यही मेरी औकात ?
                                      विशाल सर्राफ धमोरा