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Thursday, 26 March 2015

जवाब

गुजरा हूँ में कितने रेगिस्तानों से
ये हिसाब मेरे पैर के छालो से पूछो

सर्दी बहुत थी और तुम्हे हाथ तापने थे
उस अलाव की कीमत बस्तीवालों से पूछो 

संदेह की बारिश में कैसे टूटे रिश्ते
एक बार जरा मिट्टी की दीवालों से पूछो

क्यों लाल है तुम्हारे ये होंठ और जबान
इंसानी खून में सने उन निवालों से पूछो

मैं तो जानता हूँ मेरे जैसे इंसानो को
खुदा का पता उसके रखवालो से पूछो
-vishal sarraf dhamora

Saturday, 6 September 2014

चिंतामणि जी राशन की दुकान पर



आज घूमते घूमते चिंतामणी कुमार 'शोषित' फिर से मेरे घर आ गये | .....किसी गिरी हुयी सरकार के भावुक मंत्री की तरह उनके चेहरे पर बड़ा दयनीय भाव था ....आँखे तो बस तैयार थी बरसने को .... फिर मम्मी को दो चाय के लिए बोलकर और थोड़ी से हिम्मत बटोर कर .....मैंने पूछा चिंतामणी जी आज सुबह सुबह ...... सब खैरियत तो है ना ......और बस सब्र का बाँध छलक गया ..... जो भी था दिल में वो शब्दों में बह गया ...... तो चिंतामणी जी की कहानी ..... मेरी जुबानी

 होकर श्रीमती जी की रोज रोज
की खीच खीच से परेशान
लाने को राशन चिंतामणि जी
पहुच गये राशन की दूकान |

दूकान जाकर पता लगा,
आटे दाल के भाव
जा रहे सातवे आसमान,
तब बचे पैसो से चाट खाने के
उनके टूट गये अरमान |

उन्होंने जब देखा अपने बजट का हाल
की या तो आटा आएगा या फिर दाल |

और वो सोचने लगे की
अकेली दाल क्या पेट भरेगी
और आटा लिया तो
दाल की कमी अखरेगी |

तेल तो इस महंगाई में
बदन से ही निकल आएगा
पानी जब पीने को नहीं तो
नहाने का साबुन क्या काम आएगा

भगवान् को भी प्रसाद 
कहा से चढाऊंगा
कुछ दिन हाथ जोड़कर
और खीसे निपोरकर ही
काम चलाऊंगा |

और ऐसे दौड़ा कर अपनी
कल्पना के घोड़े सारे
चिंतामणी जी बिन कुछ लिए
घर वापस पधारे |

पर उनकी आँखों में “विशाल”
एक ही सवाल |
कब तक महंगाई नोचेगी
यूँ ही आम आदमी की खाल |
                        विशाल सर्राफ धमोरा
 

Tuesday, 5 August 2014

चिंतामणि जी की बस यात्रा



मेरे एक परम मित्र है श्रीमान चिंतामणी कुमार "शोषित" एक आम आदमी मेरी और आपकी तरह उनकी जिन्दगी के कुछ किस्से मेरी जुबानी .............

यात्रियों से लदी-थदी उस सरकारी बस में
करके प्रभु का विचार
‘चिंतामणि’ जी हो लिए सवार |

बस तो बस, बस थी
देश की भांति हालत उसकी भी पस्त थी |

शीशे अरमानो की तरह टूटे हुए थे
दरवाजे वामपंथियों जैसे रूठे हुए थे|

इतने में बस भी चल चुकी थी
सीटो को देख कुर्सी चाहने वालो की
हसरते भी मचल चुकी थी |

बचते-बचाते परिचालक महोदय चिंतामणि के पास आए
चिंतामणि ने दस रुपये उनकी और बढाए |

परिचालक ने चलते-चलते दस की नोट जेब में डाली,
तभी चिंतामणि ने टिकट की मांग कर डाली |

टिकट मांगने पर परिचालक ने उन्हें यूँ निहारा ,
जैसे उन्होंने उसके सर पे पत्थर दे मारा |

वो बोला टिकट को क्या तू कुतरेगा,
अभी दो मिनट बाद आम बस्ती में तु उतरेगा |

देख कर उसका ये रवैया बेबाक ,
चिंतामणि जी रह गये अवाक् |

तब चिंतामणि जी बुरी तरह बिगड़ गये ,
चप्पलों समेत परिचालक के सर पे चढ़ गये |

परिचालक भी सरकारी साला था ,
ऐसे चिंतामनियो से उसका रोज़ पड़ता पाला था |

जहाँ जरूरत थी वहा पूरा हिस्सा पहुँचाता था ,
तभी तो उस माल को अपना मानकर खाता था |

देख परिचालक के ‘सरकारी’ तेवर
सहयात्रियों ने चिंतामणि को पंगा न लेने की नसीहत दे डाली |
और इस तरह एक और आम आदमी ने
मजबूरी में ‘रिश्वत’ दे डाली |

पर चिंतामणि जी पूछ रहे “विशाल” से एक ही बात ,
मैं एक आम आदमी, क्या यही मेरी औकात ?
                                      विशाल सर्राफ धमोरा

आस्तिक



आस्तिक हूँ मै मंदिर में जाता हूँ
मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे में भी
दुआ सलाम कर आता हूँ |

भगवान पे भी चंद दलालों का कब्ज़ा है
ये एक ऐसी बात है जो
हर जगह एक सी पाता हूँ |

जाता हु उस रब से कुछ मांगने
पर उसे दीवारों में कैद पाकर
उलटे पाँव वापस आ जाता हूँ |

फिर “विशाल” जब अपने आस पास
अपने घर परिवार पर नज़र घुमाता हूँ
तो उस खुदा के अनेक रूप इन रिश्तो में पाता हूँ |

                              विशाल सर्राफ “धमोरा”


नारी या एक देह



पेड़ पे लटकी थी
रस्सी के एक टुकड़े के सहारे
वो एक बेजान देह

हंसती थी खिलखिलाती थी
चंद घंटो पहले तक जो
अब है वो एक बेजान देह

चढ़ गयी कुछ वीभत्स विचारो
की बलि वेदी पर और बन गयी
इंसान से एक बेजान देह

कुछ सपने थे कुछ अरमान भी थे
उन अरमानो के साथ लटकी है
वो एक बेजान देह

अक्सर कुचला जाता था उसका अस्तित्व
जो कभी था ही नही, वो पहले थी
एक जिन्दा देह अब है एक बेजान देह

नारी जननी जैसे शब्द तो जैसे
एक झुनझुना है जिससे उसको बहलाया है
हकीकत में है वो एक देह
कभी जिन्दा तो कभी एक बेजान देह  

चीखी थी वो चिल्लाई भी थी
पर इस कलियुग में कोई केशव भी नही
जो बचा सके उसे 
बनने से एक बेजान देह

और अब तो एक “विशाल” भीड़ है
आ गये है सभी अपनी रोटियाँ सेकने को
आखिर छोड़कर एक नारी का आवरण
आज वो बन गयी है एक बेजान देह    
                             विशाल सर्राफ “धमोरा”