Thursday, 26 November 2015

एक लम्हा

रात के अँधेरे में
अधखुले रोशनदान से
चुपके से उतर आता है
एक लम्हा

क्या तुझे याद है वो लम्हा
जब चुपके से
दुनिया से दूर एक कोने में
मेरे हाथ में रख दी थी
तूने तमाम दौलतें
और
मैं खोया था
उस मखमली हाथ की छुअन में
अधजगा सा
देख रहा था बन्द आँखों से
तेरे चेहरे पे पसरी
गुलाबी रंगत
और
थरथराते अधर
जिनसे बिन बोले कहा था तूने
तुम मेरे हो सिर्फ मेरे

और तुझे पता है
उसी एक पल में रुक गया था वक़्त
मेरे लिए
वो लम्हा जिन्दा है मुझमें
मुझसे ज्यादा ...... !!!!!!

गर कभी झाँकना हो अतीत में
तो देखना इन खामोश आँखों में
तुम्हें मिलेगा
एक मासूम हाथ और गुलाबी रंगत .........vsal

Monday, 27 April 2015

एक अपील मानवता के नाम

‪#‎plzhelphumanity‬....... ‪#‎मानवताकीमददकरें‬ ‪#‎pmnrf‬ ‪#‎paytm‬

हम सभी कुदरत की इस त्रासदी से विचलित्त है ........ हजारों जाने जा चुकी है और कितनों का जीवन मौत से बदतर हो जायेगा कोई नहीं जानता .......... लेकिन हम इंसान है जो कुदरत की इस त्रासदी के आगे खड़े है .......और हर बार उस उपरवाले को अहसास करवा देते है वो हमसे जिन्दगी छीन सकता है जीने का हौसला नहीं ........... इस बार भी हम सब साथ है उन सबके जिन्होंने इस आपदा को झेला है.......... यथा संभव मदद कीजिये ......... 1 रूपये से लेकर जितनी आप कर सकते है ........ 

* आप चाहे तो www.paytm.com पे डोनेट कर सकते है ..... जित्तनी राशी आप देंगे उतनी paytm के द्वारा दी जाएगी ...... आपका 1 रूपया नेपाल में 2 होकर पहुंचेगा ..

* आप चाहें तो सीधे pmnrf (प्रधानमंत्री राष्ट्रिय राहत कोष ) में डोनेट कर सकते है ......www.pmnrf.gov.in ............cash/ चेक/ online/ड्राफ्ट / से ...... ड्राफ्ट बनाने का कोई कमीशन भी नहीं लगेगा ...... इसमें दिया गया डोनेशन टैक्स बेनिफिट भी देगा .......

plzzz help humanity ........... 

*एक दिन थोडा सा एडजस्टमेंट करे ......और डोनेशन जितनी राशी आराम से निकल आएगी .......

** मैंने किया है .... कर के देखिये अच्छा लगेगा    ....और गर्व से कहिए हम इंसान है ....    ........इस पोस्ट का मकसद केवल और केवल यहीं है की और मदद पहुंचे ........ 

*कृपया खुद तक ना रहे .....अपने दोस्तों रिश्तेदारो को भी प्रेरित करे...... आप का छोटा सा प्रयास किसी की जिंदगी बदल सकता है 

********dedicated to humanity************** 
(पहली बार टैग के लिए सॉरी  :D)

Thursday, 26 March 2015

जवाब

गुजरा हूँ में कितने रेगिस्तानों से
ये हिसाब मेरे पैर के छालो से पूछो

सर्दी बहुत थी और तुम्हे हाथ तापने थे
उस अलाव की कीमत बस्तीवालों से पूछो 

संदेह की बारिश में कैसे टूटे रिश्ते
एक बार जरा मिट्टी की दीवालों से पूछो

क्यों लाल है तुम्हारे ये होंठ और जबान
इंसानी खून में सने उन निवालों से पूछो

मैं तो जानता हूँ मेरे जैसे इंसानो को
खुदा का पता उसके रखवालो से पूछो
-vishal sarraf dhamora

Sunday, 11 January 2015

त्रिवेणी .....एक जादू ....एक नशा



त्रिवेणी की बात चलती है तो चंद लोगो के लिए दिल से धन्यवाद निकल जाता है जिनमे पहले तो बेशक गुलज़ार साहब है जिन्होंने ये तोहफा हम सबको दिया दुसरे है अपने जुकरबर्ग साहब वो ही फेसबुक वाले (अगर ये नहीं होते तो ..........) फिर तीसरे मगर ख़ास है हमारे फेसबुकिया मित्र सिद्धार्थ भाई जिन्होंने त्रिवेणी से हमारा परिचय करवाया | अब जबसे त्रिवेणी पढ़ी हमने इसका जादू सर पे चढ़ गया और हम चाहते भी नहीं की ये वापस उतरे | :P  जब त्रिवेणी पढ़ते है तो पता चलता है की इसमें  अहसास है खालिस अहसास | 

फिर त्रिवेणी को लेकर हमने गूगल गुरु का दिमाग खाया और तभी भाई राहुल वर्मा की ‘बेअदब साँसे’ की जानकारी मिली फिर क्या था ऑनलाइन मंगवा ली (पूरे 50 रूपये का डिस्काउंट कूपन काम लेकर :D ) और पता चला
पहली आई थी ,बिना मेरी मर्जी के
आखिरी भी , बिन बताये आ जाएगी
.
बड़ी बेअदब होती है ये साँसे ..........(राहुल वर्मा - बेअदब साँसे से साभार)

जवानी की दहलीज पे खड़े होकर जब बचपन वाली ट्रेन को निकलते देखा तो आवाज आयी अरे यार  ये तो निकल गयी पता ही नहीं चला ,फिर कुछ नाकाम सी कोशिश उस ट्रेन को वापस पकड़ने की और अंत में थक हारकर अपना पिटारा सम्हाल लिया और जब उस पिटारे में रखी डायरी को खोला तो .....
खोला जब मैंने पुरानी डायरी के पन्नों को
कुछ बच्चे उसमे से झगड़ते हुए गिर पड़े
.
ना जाने मेरे कंचे गिनती में कब पूरे होगे  ........  

खैर जिन्दगी तो जिन्दगी है चलती जाती है  मगर इस भाग दौड़ के बीच जब चारो और से दुनियादारी की दीवारे घेर लेती है और दम घुटने लगता है तब ....
ये ऊँची ऊँची दीवारे दम घोंट ही देती
अच्छा हुआ एक झरोखा रख लिया था
.
आज भी मुझे मेरा बचपन खेलता हुआ नजर आता है ...........
यूँ तो बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया.....फिर भी कुछ दौलत अलग किस्म की भी होती है जिन्हें कही से खरीदा नहीं जा सकता वो मिलती है तो मुफ्त में ......
अक्सर चला जाता हूँ पुराने स्कूल के मैदान में
वापस आते वक़्त थोडा और अमीर हो जाता हूँ
.
हसीन लम्हों के बेहिसाब मोती छिपे है उस मिटटी में ......

वक्त तो सभी को बदल देता है और हमारे साथ साथ हमारा गाँव भी बदल गया ....बहुत कोशिश की फिर से उसी गाँव को ढूँढने की पर .....
कभी ढूँढा मैंने पीपल के ठूंठ के पीछे
और कभी उस सूखे कुए की मुंडेर पर
.
विकास की भीड़ में मेरा वो गाँव लापता है
बचपन गया गाँव छुटा और इसी दौरान रिश्तों का खेल भी देखा  .......और कहीं से आवाज आयी
ताश के पत्तो का महल क्या बना लिया
मैं खुद को बादशाह समझने लगा था
.
हवा का झोंका, अरमानो की लाशें , और बेवा तन्हाई.......
और आज भी जिन्दगी के किसी मोड़ पर जब पीछे पलटकर देखते है तो पता चलता है .......
ये जो कामयाबी का पेड़ लहराता है
इस पर कुछ बुरी रूहों का बसेरा है
.
मासूम अरमानो का खून बिखरा है इसके इर्द गिर्द.....
त्रिवेणी कुछ ऐसी ही है (मुझे तो ऐसी ही लगी) ........ बाकि तो जी दुनियाँ बहुत बड़ी है सुना है 200 से ज्यादा देशो की सरहदे है .............
मेज पर रखा एक बड़ा सा गोला
कही हरा कही पीला बाकी का नीला
.
कितना अच्छा होता अगर टेढ़ी-मेढ़ी काली लकीरें नहीं होती .......... 

फिर से मिलते है जल्द ही :) :) :)   



Sunday, 21 September 2014

कश्मीर



बिलावल भुट्टो कहता है  मैं कश्मीर वापस ले लूँगा  ............ क्या समझता है कश्मीर कोई खिलौना है जो छीन लेगा ........ और हम बैठे रहेगे हाथ पर हाथ धरे ........ भूल है उसकी .......

कश्मीर देखने से पहले तू अपनी औकात देख
कश्मीर के लिए धडकते दिलो के जज्बात देख
****************************************
सीमा पे चमकती दोधारी भारतीय तलवार देख
भारत की तरफ उठे, कटे सिरों का हिसाब देख
****************************************
मत समझ लाचार तू , कश्मीर को परेशान देख
कर ले दो दो हाथ, तू हमारे लहू का उबाल देख
****************************************
जा मौका दिया, अपनी पसंद का कब्रिस्तान देख
सीमा पर आ , आखिरी बार अपना परिवार देख
****************************************
-विशाल सर्राफ धमोरा          



Saturday, 20 September 2014

बचपन

बचपन ........ जो जब पास  है तब पता नहीं चलता और बीतने के बाद मिल नहीं  पाता........... भले बचपन बीत जाता है पर सभी के अन्दर जिन्दा रहता है एक बच्चा .......... जो कभी सामने आ जाता है और कभी छुपा रहता है ....... डरा सहमा सा दुनिया की भीड़ से डरकर ............. उसी बचपन की कुछ यादें 

वो बचपन में दिनभर यूँ ही उधम मचाना
कभी चिड़ियाँ कभी तितली के पीछे दौड़ जाना

बीच राह में अक्सर यूँ ही मचल जाना
चलते चलते गिरना और गिरकर संभल जाना

देख टॉफी अचानक मोम सा पिंघल जाना
वो सर्दी गर्मी बरसात सभी का मखौल उड़ाना

ढर्रेदार दुनियां में थोड़ी बेतरतीबी फैलाना
कभी बात बेबात बगावत पर उतर आना

सुनकर परीकथाए सपनों में खो जाना
भूलके जहाँ को माँ की गोद में सो जाना

कभी राजा, मंत्री कभी चोर बन जाना
दुनिया में अपनी अलग सरकार चलाना

“विशाल” टूटे खिलोनो को बार बार चिपकाना
बचपन का मोल सब गुजर जाने के बाद जाना   

-विशाल सर्राफ धमोरा